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अकेले होते ही छा जाती है बेचैनी || आचार्य प्रशांत संवाद || आचार्य प्रशांत मोटीवेशन स्टोरी || आचार्य प्रशांत

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  "जब सबके साथ होते हैं या कोई काम कर रहे होते हैं तब तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही अकेले बैठते हैं तो बेचैनी जैसा होता है। मन में ऐसा होता है कि कुछ मिसिंग है, खालीपन सा है। समझने की कोशिश करता हूँ, लेकिन समझ में नहीं आता है क्या बात है?" आचार्य प्रशांत:  जिनके साथ काम कर रहे हो और जो काम कर रहे हो उसमें अगर दम ही होता, तो उस काम ने तुम्हारा पूरा दम निचोड़ लिया होता न? यह सब अनुभव करने के लिए, सोचने के लिए तुम बचे कहाँ होते कि- खालीपन है, अधूरापन है, क्या करूँ? क्या न करूँ? दिक्कत शायद उन पलों में नहीं है जब अधूरेपन या खालीपन का अनुभव होता है। दिक्कत शायद वहाँ है जहाँ इस खालीपन का अनुभव नहीं होता है। जहाँ ये अनुभव नहीं हो रहा है, वहाँ ये खालीपन दबा हुआ है, छुपा हुआ है। काम क्या बन जाता है? आंतरिक हकीकत को छुपाने का बहाना। अपने आपको व्यस्त रख लो, कुछ सोचने समझने का मौका ही नहीं मिलेगा। उसमें दिक्कत बस छोटी सी यह है कि अगर जिस काम में अपने आपको व्यस्त रख रहे हो वह सही नहीं है, तो उसमें अपने आप को तुम पूरी तरह से झोंक पाओगे नहीं। उसमें तुम्हारा मन पूरे तरीके से कभी लीन होगा नहीं औ...

दमित जीवन ही उत्तेजना मांगता है

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  दमित जीवन ही उत्तेजना मांगता है प्रश्नकर्ता:  सर, कल मेरी एक दुर्घटना हुई| उसके बाद एक सुरूर-सा छा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है? आचार्य प्रशांत:  हम इतनी छोटी, तेजहीन और ओछी ज़िंदगी जीते हैं कि उसमें किसी भी प्रकार की असुरक्षा के लिए, ख़तरे के लिए, यहाँ तक कि विविधता तक के लिए जगह नहीं होती है। एक राजा की कहानी है। उसने पूरी सुरक्षा के लिए एक महल बनवाया। महल बहुत मज़बूत, अभेद्य दुर्ग। उससे किसी ने पूछा, “दीवारें तो बहुत मज़बूत हैं, पर क्या दरवाज़े मज़बूत हैं?” उसे किसी ने सलाह दी कि दरवाज़े भी उतने ही मज़बूत होने चाहिए। तो उसने दीवारों से दरवाज़े भी ढक दिये, और सिर्फ एक दरवाज़ा छोड़ा। उसे फिर किसी ने सलाह दी कि ख़तरे के आने के लिए तो एक दरवाज़ा भी काफ़ी है, तो यह भी बंद कर दो। और अंततः उसने अपने किले को ही अपना ताबूत बना लिया। वो किला उसका मकबरा बन गया। हमारा जीवन करीब-करीब ऐसा ही है। फर्क नहीं पड़ता कि हमने जीवन के कितने साल बिता लिए हैं, लेकिन डर के मारे हम किसी भी प्रकार के खतरे के करीब भी नहीं गए होते हैं। जो खतरे, जो चुनौतियाँ जीवन अपनी सामान्य गति में भी प्रस्तुत करता रहा है, हम ...

ताकत मत मांगो, देखो कि क्या कमज़ोर हो

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  ताकत मत मांगो, देखो कि क्या कमज़ोर हो प्रश्नकर्ता:  सर, ताकत पाने के लिए क्या किया जाए? आचार्य प्रशांत:  तुममें ताकत ही ताकत है, कमज़ोरी कहाँ है? तुम्हें क्यों लगता है कि कोई ख़ास ताकत होनी चाहिए तुम्हारी? ज़रूर कमज़ोरी का कुछ एहसास है जिसके कारण ताकत की बात कर रहे हो। ताकतवर कहाँ ताकत की बात करता है? कभी किसी स्वस्थ आदमी को देखा है स्वास्थ्य की चर्चा करते हुए? स्वास्थ्य की चर्चा तो बीमारी की मौजूदगी में ही की जाती है। सबसे ज़्यादा स्वास्थ्य कब याद आता है? जब बीमार होते हैं। तो क्यों बात कर रहे हो ताकत की? कमज़ोरी कहाँ है? और अगर ताकत की बात कमज़ोरी के एहसास से निकली है, तो पहले क्या आया? ‘कमज़ोरी का एहसास’ — तो क्यों न उसकी बात करें। क्योंकि अगर कमज़ोरी का एहसास न हो तो ताकत की बात छिड़ेगी ही नहीं। कमज़ोरी का एहसास कहाँ से आया? किसने तुम्हें कहा कि, ‘तुम कमज़ोर हो’? प्र१:  सर, कहा किसी ने नहीं बस कभी-कभी अन्दर से ही ऐसा लगता है। आचार्य:  तुमसे जो पहली बात कही मैंने तुमने उसे ठीक से समझा क्या? यह सवाल ही कौन पूछता है कि, “मुझमें कोई ताकत है या नहीं”, यह कौन पूछता है? जिसको...

मैं किसी भी नियम पर चल क्यों नहीं पाता?

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  मैं किसी भी नियम पर चल क्यों नहीं पाता? प्रश्नकर्ता:  मैं नियम तो बनाता हूँ पर उन पर चल नहीं पाता। ऐसा क्यों? आचार्य प्रशांत:  जिनको तुम कह रहे हो कि ‘अपने’ नियम बनाता हूँ, वो भी वास्तव में तुम्हारे नियम नहीं हैं, वो बाहर से आये हुए नियम हैं, संस्कारित नियम हैं। तो उनपर तुम चलोगे तो सही, पर तभी तक चलोगे जब तक कोई और आ कर तुम्हें कुछ और नहीं दे देता। तुमने अभी कुछ देखा, कहीं गये और बहुत प्रभावित हो गये और तुमने अपने लिए एक नियम बना लिया, जो देखा सुना उससे। और दो दिन बाद कोई दूसरा प्रभाव तुम पर आ गया। तो क्या होगा पहले प्रभाव का और क्या होगा उन नियमों का? वो सब तिरोहित हो जायेंगे, कुछ बचेगा नहीं उनमें से। (बिजली चली जाती है और हॉल में शोर होता है) अब ये स्पष्ट उदाहरण है कि क्या होता है नियमों का। जब तक रोशनी रही, तब तक तो नियम कायम रहे। पर ज्यों ही एक बाहरी अवस्था बदली तो जितने साँप, छछूंदर छुपे हुए थे बिलों में, वो सब बाहर आ गये। कुछ कीड़े होते हैं जो मात्र अँधेरे में ही निकलते हैं और वो सब निकल पड़े थे। (सब श्रोतागण झेंप जाते हैं) तो इसलिए नियम कभी प्रभावकारी हो नहीं सकता...

मन प्रशिक्षण अनुरूप ही विषय चुनेगा

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  मन प्रशिक्षण अनुरूप ही विषय चुनेगा प्रश्नकर्ता:  मेरी कमज़ोरी यह है कि मैं एकाग्र नहीं हो पाती हूँ। तो एकाग्रता को मैं अपनी ताकत कैसे बनाऊँ? आचार्य प्रशांत:  तो सीधे सीधे सवाल ये है कि एकाग्रता बढ़ाएं कैसे? आचार्य जी  (श्रोताओं की तरफ देखते हुए) :  तो कितने लोग एकाग्र नहीं हो पाते हो? (सभी श्रोता हाथ उठाते हैं) आचार्य जी  (मुस्कुराते हुए प्रश्नकर्ता की ओर देखते हुए) :  यह तुम्हारी कमज़ोरी कहाँ है? यह तो सार्वजनिक कमज़ोरी है। यह तो मुझे लग रहा है कि कोई विश्वव्यापी समस्या है। कोई है जो कहता हो कि ‘नहीं, एकाग्र जहाँ चाहतें हैं वहाँ हो जाता है?’ ऐसा भी कोई है? (एक-दो श्रोताजन कहते हैं कि हो जाता है) आचार्य:  दो -चार हैं जो दावा करते हैं कि जो चाहतें हैं, मन को वहीं ले जाते हैं। (आचार्य जी प्रश्नकर्ता से उनका नाम पूछते हैं, जिनका नाम शुभि है) आचार्य:  एक तो ये कि बात तुम्हारी नहीं है, यहाँ जितने बैठे हैं बात सभी की है। और दूसरी ये कि आज कि नहीं है। सदा की रही है। सदा रहेगी भी शायद। बात है क्या? जिसको हम एकाग्रता कहते हैं, वो है क्या? तुम कब कहते हो...