मन प्रशिक्षण अनुरूप ही विषय चुनेगा

 


मन प्रशिक्षण अनुरूप ही विषय चुनेगा

प्रश्नकर्ता: मेरी कमज़ोरी यह है कि मैं एकाग्र नहीं हो पाती हूँ। तो एकाग्रता को मैं अपनी ताकत कैसे बनाऊँ?

आचार्य प्रशांत: तो सीधे सीधे सवाल ये है कि एकाग्रता बढ़ाएं कैसे?

आचार्य जी (श्रोताओं की तरफ देखते हुए): तो कितने लोग एकाग्र नहीं हो पाते हो?

(सभी श्रोता हाथ उठाते हैं)

आचार्य जी (मुस्कुराते हुए प्रश्नकर्ता की ओर देखते हुए): यह तुम्हारी कमज़ोरी कहाँ है? यह तो सार्वजनिक कमज़ोरी है।

यह तो मुझे लग रहा है कि कोई विश्वव्यापी समस्या है। कोई है जो कहता हो कि ‘नहीं, एकाग्र जहाँ चाहतें हैं वहाँ हो जाता है?’ ऐसा भी कोई है?

(एक-दो श्रोताजन कहते हैं कि हो जाता है)

आचार्य: दो -चार हैं जो दावा करते हैं कि जो चाहतें हैं, मन को वहीं ले जाते हैं।

(आचार्य जी प्रश्नकर्ता से उनका नाम पूछते हैं, जिनका नाम शुभि है)

आचार्य: एक तो ये कि बात तुम्हारी नहीं है, यहाँ जितने बैठे हैं बात सभी की है। और दूसरी ये कि आज कि नहीं है। सदा की रही है। सदा रहेगी भी शायद। बात है क्या? जिसको हम एकाग्रता कहते हैं, वो है क्या? तुम कब कहते हो कि मन एकाग्र है?

तो तुमने कोई चीज़ पकड़ी है, और तुम उस चीज़ के बारे में सोचना चाहते हो। उसी को दूसरे शब्दों में कहते हैं कि तुमने एक विषय चुना है। और तुम चाहते हो कि विचार का वही विषय रहा आये। वो किसी और विषय पर ना जाए। यही चाहते हो ना? देखो दो तीन बातें हैं जो तुम्हें समझनी पड़ेंगी फिर तुम्हें स्पष्ट हो जाएगा कि मन एकाग्र क्यों नहीं हो पाता है। पहली तो है कि मन कौन सा विषय चुनता है? मन हमेशा किसी न किसी विषय को तो पकड़ कर रखता ही है, यही फितरत है उसकी। कोई न कोई विषय उसको चाहिए। कुछ न कुछ ख्याल चलता रहना चाहिए और हर ख्याल का एक विषय होता है। ठीक है ना? हम सब के मन में तमाम ख्याल चलते ही रहते हैं। ये बताओ कि ये कैसे तय होता है कि कौन किस बारे में सोचेगा। मन में विचार तो चलते ही रहते हैं। दुनिया में क्या कोई ऐसा है जिसका मन विचारों से खाली रहता हो? शायद ही कोई। मन विचारों से भरा ही रहता है और हर विचार का क्या होता है? एक विषय होता है। जब भी तुम कहोगे कि सोच रहा हूँ, तब तुम्हें ये भी कहना पड़ेगा कि किस बारे में? तुम जिस बारे में सोच रहे हो, उसको क्या बोलेंगे?

प्र (एकसाथ कहते हैं): विषय।

आचार्य: अब मुझे ये बताओ कौन किस बारे में सोचता है? दुनिया में इतने लोग हैं, सब सोच रहे हैं। कोई कुछ सोच रहा है, कोई कुछ सोच रहा है। ये तय कैसे होता है कि कोई क्या सोच रहा है?

प्र: सर, जिसके साथ जो घटनाएँ घटी हैं उसके बारे में।

आचार्य: तुम्हारे साथ बहुत सारी घटनाएँ घटी हैं अब तक जीवन में। काफी लंबा जी चुकी हो। क्या जितनी भी घटनाएँ घटी हैं तुम्हारे दशकों के जीवन में, सबके बारे में सोचती रहती हो? सब याद भी हैं? जितनी घटनाएँ तुम्हारे साथ घटी हैं, छोटी-बड़ी, उनका कितना प्रतिशत याद है? कोई दावा करेगा की पचास प्रतिशत याद है? कोई दवा करेगा कि आज तक जितनी घटनाएं घटी हैं, उनका पांच प्रतिशत भी याद है? कोई दावा करेगा की आज सुबह से ले कर अभी तक जितनी घटनाएं घटीं हैं, जितनी माने जितनी, प्रतिपल की घटना उसका पचास प्रतिशत भी याद है? मुश्किल हो जाता है, है ना? तुम इस हॉल में आये हो, तभी से ले के अब तक जितनी घटनाएं घटी हैं, क्या याद हैं सारी? जितनी माने, जितनी। मैं उनकी ही बात नहीं कर रहा जितनी तुम्हें याद हैं। मैं सारी घटनाओं कि बात कर रहा हूँ।

प्र: नहीं सर।

आचार्य: नहीं ना। तो तुमने ये कहा कि हर आदमी वही सोचता है, जो उसका अनुभव हो चुका है। पर क्या तुम अपने सारे अनुभवों के बारे में सोचते हो? नहीं। तुम अपने कौन से अनुभवों को याद रखते हो? ध्यान से देखो।

प्र: सर जिसके बारे में हमें सबसे ज्यादा अच्छा लगेगा या बुरा लगेगा, हम उसके बारे में ज्यादा सोचेगें।

आचार्य: अनुष्का ने तो पूरी बात तुरंत पकड़ ली। अनुष्का ने कहा या तो बहुत अच्छा लगे, या बहुत उसने चिंता दी हो, तनाव दिया हो। याने कि बड़ा दहशत वाला हो। या तो बड़ा प्रिय, या तो बड़ा अप्रिय, ये दोनों बातें ही याद रहतीं हैं। हम जो पूरी धार पकड़ रहे हैं, इसको छोड़ना नहीं। हमने यहाँ से शुरू किया था की एकाग्रता क्या है। एकाग्रता से हम यहाँ पर आये कि एकाग्रता का अर्थ होता है कि मन किसी एक विषय पर जा कर बैठा रहे। फिर हमने कहा कि मन सोचता तो रहता ही है। और सोचने के विषय हमेशा अलग-अलग हैं। तो हमने जानना चाहा कि मन क्या सोचता रहता है। तो किसी ने कहा कि मन अपने अनुभवों के बारे में सोचता रहता है। फिर हमने जानना चाहा कि कौन से अनुभवों के बारे में। तो बात खुल रही है कि मन अपने सबसे पसंदीदा और अपने सबसे अप्रिय अनुभवों के बारे में ही सोचता रहता है। ये जो पूरी लाइन है इसको छोड़ना नहीं। एक कदम और आगे बढ़ाते हैं। क्या सब लोगों को एक ही बात प्रिय होती है ?

प्र: नहीं सर।

आचार्य: क्या सब लोगों को एक ही बात अप्रिय होती है?

प्र: नहीं सर।

आचार्य: किसको क्या पसंद है और किसको क्या नापसंद है, ये कैसे तय होता है?

चीन और जापान में तनाव चल रहा है। चीन का पलड़ा भारी है। ये बात किसो प्रिय लगेगी और किसको अप्रिय?

प्र: चीन को प्रिय लगेगी और जापान को अप्रिय।

आचार्य: चीन तो कुछ है नहीं ना, चीनी होते हैं। तो अगर तुम चीनी हो, तो तुम्हें क्या प्रिय लगेगा? चीन का जीतना, और अगर तुम जापानी हो तो तुम्हें क्या प्रिय लगेगा ?

प्र: जापान का जीतना।

आचार्य: तो खबर आई कि चीन हावी हो रहा है। तुरंत कोई खुश हो गया और तुरंत कोई उदास हो गया। एक ने सोचा, ‘वाह’ और एक के दिल से निकली, ‘आह’। ये बात, ये नज़रिए, ये सोच, कहाँ से आयी दोनों में? चीनी में भी, जापानी में भी, ये कहाँ से आयी?

प्र: खबर।

आचार्य: खबर तो दोनों के लिए एक थी। एक सामान खबर आयी। इधर बैठे हैं चीनी, और इधर बैठे हैं जापानी। क्या खबर आयी है?

(श्रोतागण खबर दोहरातें हैं)

चीनी ने कुछ और सोचा और जापानी ने कुछ और सोचा। तो ये दोनों की सोच कहाँ से आ रही है?

अच्छा यहाँ चीनी बच्चे बैठे हुए हैं और कक्षा के दूसरे तरफ जापानी बच्चे बैठे हुए हैं मान लो चौदह- चौदह साल के हैं, तो जैसे ही बताया जाएगा कि चीन का पलड़ा भारी है, चीनी बच्चे क्या कहेंगे?

प्र: वाह

आचार्य: और जापानी बच्चे?

प्र: आह

आचार्य: इन बच्चों की उम्र कम करते जाते हैं। अब ये चौदह साल के नहीं हैं, अब ये छह साल के हैं। ये छह साल के चीनी बच्चे, ये छह साल के जापानी बच्चे। खबर आती है। चीनी बच्चे क्या कहेंगे ?

प्र: वाह।

आचार्य: जापानी बच्चे क्या कहेंगे?

प्र: आह

आचार्य: अब बच्चों की उम्र और कम हो जाती है। अब बच्चे और मासूम हो गए हैं। दो साल के, ढाई साल के। उन्हें खबर दी गयी, चीन जीत रहा है।

प्र: उन्हें कोई मतलब नहीं होगा।

आचार्य: कोई मतलब नहीं। सोच नहीं आयी। अब तुम मुझे बताओ कि तुम्हारे दिमाग को जो प्रिय लगता है, और अप्रिय लगता है, वो कहाँ से आता है? वो थिंकिंग तुममे कहाँ से आयी?

प्र: आयु से।

आचार्य: आयु ने तुम्हें क्या दिया? तीन साल के बच्चे और छह साल के बच्चे में सोच का अंतर कहाँ से आ गया?

प्र: एक्सपीरियंस।

आचार्य: एक्सपीरियंस का अर्थ क्या है?

प्र: अनुभव।

आचार्य: अनुभव का आधार क्या है?

(श्रोता उत्तर देने में असमर्थ, आचार्य जी उनकी मदद करते हुए आगे बढ़ते हैं )

प्र: सराउंडिंग

आचार्य: सराउंडिंग। जो कुछ भी आस पास है। क्या मैं कहूँ माहौल?

प्र: जी सर।

आचार्य: क्या मैं कहूँ वातावरण?

प्र: जी सर। आचार्य: क्या मैं कहूँ दूसरे, स्थितियां, लोग?

प्र: जी सर।

आचार्य: तो सोच कहाँ से आयी?

प्र: दूसरों ने दी।

आचार्य: यहाँ जो चीनी बच्चे थे, उन्हें दूसरों ने क्या सिखाया?

प्र: चीन से प्यार करो।

आचार्य: जो जापानी बच्चे थे, उन्हें दूसरों ने क्या सिखाया?

प्र: जापान से प्यार करो।

आचार्य: तो तुम्हारी सोच, क्या तुम्हारी होती है?

प्र: नहीं होती सर।

आचार्य: तुम्हारे नज़रिये क्या तुम्हारे होते हैं?

प्र: नहीं सर।

आचार्य: अब देखो बात कहाँ तक पहूँची। हमने पूछा था, ‘मन एकाग्र क्यों नहीं हो पाता है?’ हमने कहा था कि मन किसी एक ख़ास विषय पर जा कर बैठे। फिर हमने कहा था मन किसी एक विषय पर जा कर बैठा ही रहता है। हम सोचते ही रहते हैं। तो फिर हमने जानना चाहा कि मन कौन से विषय चुनता है? तो वहाँ से अनुष्का ने बताया कि मन दो ही विषय चुनता है- जो उसे बहुत पसंद हों या जो उसे बहुत नापसंद हों। तो फिर हमने जानना चाहा कि ये पसंद, नपसंद, ये नज़रिये, ये हमे मिलते कहाँ से हैं? तो अब हमें पता चलता है कि वो अब हमें हमारे माहौल से मिलते हैं। तो अंततः मन कहाँ जा कर बैठता है। मन किस वस्तु पर एकाग्र हो जाता है? ये तुम्हें कहाँ से मिला?

प्र: माहौल से मिला।

आचार्य: माहौल से मिला। इसको कहते हैं मन का संस्कारित होना। इसी को मन की कंडीशनिंग कहते हैं। तो अब हम सवाल थोड़ा सा बदलेंगे। मन एकाग्र तो होता ही है। एकाग्रता कोई समस्या नहीं है। लगता हमें यही है कि एकाग्रता समस्या है। एकाग्रता समस्या नहीं है। मन एकाग्र तो होता ही है। अब प्रश्न ये है कि मन इस प्रकार के विषयों पर क्यों एकाग्र होता है? तुमने एक विषय कहा उस पर नहीं एकाग्र हो रहा वो। वो कहीं और जा करके बैठना चाहता है। और हमने देखा है कि मन वहीँ जा करके बैठता है जैसा उसे सिखाया गया है। किसके द्वारा?

प्र: दूसरों के द्वारा।

आचार्य: मन उड़-उड़ कर वहीँ बैठेगा जहाँ बैठने की उसको लगातार शिक्षा दी गयी है। एकाग्रता की कोई समस्या है ही नहीं। कोई मूवी देखने जाते हो, फ़िल्म देखने, देखा है कितने एकाग्रचित हो कर देखते हो? क्या तब तुम ये शिकायत करने आते हो कि सर कंसन्ट्रेट नहीं कर पा रहे हैं? क्रिकेट मैच देखते हो। देखा है कितने एकाग्र हो करके देखते हो? क्या तब तुम ये शिकायत करते हो कि सर एकाग्रता नहीं बनती? तो तुम्हारे पास एकाग्रता कि कोई कमी नहीं है। तुम सब एकाग्र होना जानते हो। प्रश्न ये है कि हम किन विषयों पर एकाग्र होते हैं। हमने मन को कैसा संस्कारित किया है। हमने किन जगहों पर मन को रुचि लेना सिखा दिया है। मन के पास अपने कोई इंटरेस्ट नहीं होते, कोई रुचियाँ नहीं होतीं। कभी ये दावा मत करना कि मेरी रुचि इस काम में है। सारी रुचियाँ मन को सिखाई जातीं हैं। एक विद्वान ने एक बच्चे के मन के लिए नाम दिया है, ‘टेबुला रासा ‘, खाली स्लेट, खाली स्थान। उसमें कुछ लिखा नहीं होता। ना रुचि लिखी होती है, ना अरुचि लिखी होती है। तुम उसमें रुचियाँ -अरुचियाँ खुद भरते हो। तुम्हारे जीवन के प्रारम्भ में रुचियाँ -अरुचियाँ भरी जातीं हैं, माहौल द्वारा, जिसमें तुम्हारा कोई बस नहीं है। और एक उम्र के बाद वो रुचियाँ -अरुचियाँ तुम्हारे ही द्वारा भरीं जातीं हैं। तुम जैसी ट्रैनिंग दे रहे हो, मन को, मन उसी के अनुसार एकाग्रता का विषय चुन लेता है। तुमने जो धारणाएँ बना रखी हैं, मन उसी के अनुसार कहीं पर जाके बार बार बैठने की शिक्षा पा लेता है।

उदाहरण देता हूँ:

तुमने ये धारणा बना रखी है कि जो भी किया जाए वो अंततः किसी परिणाम के लिए किया जाए। अगर जीवन के बारे में तुमने ये धारणा पाल ली है, किसी कारणवश, किसी प्रभाववश, कि जो भी किया जाए वो किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाए, तो तुम्हारा मन लगातार लगातार एकाग्र रहेगा उद्देश्य पर। नतीजा क्या होगा? कि तुम जो कर रहे हो मन उसमें कभी एकाग्र नहीं हो पायेगा। क्योंकि उद्देश्य दूर कहीं भविष्य में बैठा हुआ है। और यदि तुम्हारे मन में ये बात भर दी गयी है कि जीवन इसीलिए है ताकि कुछ उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके, तो तुम जो कुछ भी करोगे छोटा काम, बड़ा काम तुम्हारा मन कभी उसमें लग ही नहीं सकता। क्यों? क्योंकि तुम्हें ये बता दिया गया है कि काम छोटा है और उद्देश्य बड़ा है। तुम्हें ये बता दिया गया है कि राह महत्वहीन है, मंज़िल महत्वपूर्ण है। अब ये तो बड़ी मज़ेदार बात हो गयी क्योंकि राह महत्वहीन है, तो तुम चलोगे कैसे? किसी पढ़ने वाले को अगर यदि बता दिया जाए कि पढ़ाई इसीलिए है ताकि परिणाम अच्छे आ सकें, तो फिर पक्का ही है कि वो पढ़ नहीं पायेगा। क्योंकि उसकी नज़र हमेशा कहाँ रहेगी?

प्र: परिणाम पर।

आचार्य: परिणाम पर। और अगर उसे ये भी बता दिया जाए कि बिन पढ़े भी परिणाम हासिल हो सकता है, तो तो वो बिल्कुल ही नहीं पढ़ेगा। क्योंकि उसके मन को संस्कार ही ये दे दिया गया है कि महत्वपूर्ण क्या है?

प्र: परिणाम।

आचार्य: परिणाम मिल रहा है, बिना पढ़े मिलता है तो अच्छी बात है। किसी को यदि ये संस्कार दे दिया जाये कि पैसा बहुत महत्वपूर्ण है, तो फिर वो कभी भी प्रेमपूर्ण हो कर किसी काम को नहीं कर पायेगा। क्योंकि महत्वपूर्ण क्या है काम या पैसा?

प्र: पैसा।

आचार्य: उसको तो ये शिक्षा दे दी गयी है कि पैसा बहुत महत्वपूर्ण है। उसका काम में मन कभी लगेगा ही नहीं, क्योंकि काम अब उसके लिए बस एक माध्यम है। सिर्फ एक जरिया है। क्या करने का?

प्र: पैसा कमाने का।

आचार्य: और जब भी, कुछ भी जब तुम्हारे लिए एक जरिया बन जाता है तो तुम उसकी उपेक्षा करना शुरू कर देते हो। वो तुम्हारे लिए सिर्फ एक उपयोग की चीज़ हो जाता है। तुम उपयोग करोगे और उसका तिरस्कार कर दोगे। तुम उसमें डूब नहीं सकते, तुम उससे प्रेम नहीं कर सकते। उसका उपयोग बस कर सकते हो। और उपयोग में और प्रेम में अंतर होता है ना कि नहीं होता है?

प्र: होता है सर।

आचार्य: बात समझ में आ रही है? तो एकाग्रता प्रश्न है ही नहीं। प्रश्न ये है कि हमने मन को क्या सिखाया है? कि जीवन में क्या महत्वपूर्ण है? तुमने मन को जो भी सिखाया होगा कि ये महत्वपूर्ण है, मन वहीँ पर जा कर के बैठ जाता है। फिर से बोल रहा हूँ। एकाग्रता कि कोई कमी नहीं है। एकाग्रता कोई मुद्दा ही नहीं है। एकाग्र तो हम सब हो ही जाते हैं। सवाल ये है कि कहाँ पर एकाग्र हो जाते हैं? कहाँ पर एकाग्र होगा मन? मन वहीँ एकाग्र होगा, जो मन को बता दिया गया है कि महत्वपूर्ण है। मैं तुमसे पूछ रहा हूँ अब कि तुमने जीवन में किन बातों को महत्वपूर्ण मान रखा है? और पक्का बता रहा हूँ कि जो कुछ भी तुमने महत्वपूर्ण मान रखा है वहाँ ही जा कर तुम्हारे मन बार-बार अटक जाता है। उसी डाल पर तुम्हारा पंछी जा के बार बार बैठ जाता है। तो गौर से देखो अपने मन को और उससे पूछो कि क्या है जो तूने महत्वपूर्ण मान रखा है? किन मूल्यों को पकड़ कर के बैठा हुआ है तू? तेरी धारणाएं क्या हैं? जो तुम्हारी धारणा होगी, वहीँ तुम एकाग्रचित हो जाओगे। तुमसे एक प्रश्न पूछ रहा हूँ। तुममें से कितना लोगों ने वाकई में पूरी ईमानदारी से माना है कि जीवन में और सब चीज़ों से ज्यादा ज्ञान महत्वपूर्ण है? जिस किसी ने ये पूरी गहराई से माना होगा, सिर्फ दावा करने से नहीं होगा, बात ईमानदारी की है। जिस किसी ने पूरी गहराई से ये माना होगा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान है, उसको तो एकाग्रचित होते देर ही नहीं लगेगी। वो कहेगा ज्ञान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ज्ञान खाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर में पढ़ रहा हूँ तो में खाने नहीं जा सकता। ज्ञान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ज्ञान मेरे रिश्ते-नातों, दुनियादारी से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर में पढ़ रहा हूँ तो मैं मोबाइल फ़ोन पर आती हुई कॉल का जवाब नहीं दे सकता। पर क्या तुम्हारे साथ ऐसा होता है कि यदि तुम पढ़ रहे हो, तो कुछ भी हो जाए तुम अपने आसन से हिलते नहीं? इसका अर्थ समझो। तुम पढ़ रहे हो और दरवाजे पर तुम्हारा दोस्त दस्तक देता है। तुम पढ़ाई छोड़ कर दोस्त के साथ चल देते हो’ इसका मतलब तुम्हारे मन ने ज्यादा महत्वपूर्ण क्या माना?

प्र: दोस्त को।

आचार्य: अब जब तुमने अपने आप को ये संस्कार दे रखा है कि दोस्ती, ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है, तो निश्चित सी बात है कि मन किताब से ज्यादा दोस्त पर एकाग्र होगा। हो गयी गड़बड़। अब क्या करें? ये तो मन ने धारणाएं ही उलटी -पुल्टी भर रखी हैं। तुमने यदि मन को बता रखा है कि जीवन में भय बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ है। अगर तुम्हारी दृष्टि ये है कि दुनिया भय से चलती है तो फिर तुम पढ़ोगे कब?

प्र: जब भय होगा।

आचार्य: और यदि भय नहीं है तो तुम नहीं पढ़ोगे। तो फिर तुम्हारी एकाग्रता भय पर है। तुम भय का इंतज़ार करोगे। तुम फिर इंतज़ार करोगे कि भय कब आये और मैं पढूं। और फिर मात्र भय ही है जो तुमसे कुछ करवा सकता है। उसके बिना तुम कुछ करोगे नहीं। अब अभी भय है, नहीं तो तुम कैसे पढ़ो। फिर तुम कहते हो कि एकाग्र नहीं हो पा रहे। कैसे हो पाओगे? तुमने महत्वपूर्ण किसको माना है? अभी भय ही नहीं है, तो एकाग्रता कहाँ से लायी जाये। कोई मिल जाए डराने वाला, दो-चार डंडे लगाए, तुरंत एकाग्रता आ जायेगी। होता है कि नहीं होता है? यदि ऐसा होता है तो समझो कि तुम्हारे मन में उलटी-पुल्टी धारणाएं ठूस दी गयी हैं। इस दुनिया ने, समाज ने, परिवार ने तुम्हें कुछ ऐसा सिखा दिया है जो झूठा है। तुम्हें जीवन को देखने की एक नकली दृष्टि दे दी गयी है। तुम जिन बातों को मूल्यवान समझ रहे हो वो मूल्यवान है ही नहीं। तुम्हारा मन उड़-उड़ कर जिस डाल पर बैठ रहा है, उस डाल पर ना कोई फल है, ना कोई पत्ती। तुम्हारे मन को शिक्षा दे दी गयी है सूनी, बजर डालों पर बार-बार जा कर बैठ जाने की। तो मन एकाग्र तो हो रहा है पर ऐसी जगहों पर जहाँ से तुम्हें कुछ मिल सकता नहीं। मन जा जा करके ऐसी डालों पर बैठ रहा है जिनमें तुम्हारे लिए कोई रस है ही नहीं। तुम्हारे मन को भय से चलने कि शिक्षा दे दी गयी है, लालच से चलने की शिक्षा दे दी गयी है। अब अगर लालच महत्वपूर्ण है तो तुम कुछ भी कब करोगे? जब उसके पीछे कोई लालच खड़ा हो। और यदि लालच नहीं है, तो कर ही नहीं पाओगे। यदि लालच नहीं है, तो होगा ही नहीं तुमसे। लेकिन घबराने की ज़रुरत नहीं है। मन को जैसे संस्कारों से भरा गया उसी तरीके से मन को धारणाओं से मुक्त भी किया जा सकता है। तुम सब होशियार हो, तुम सब के पास क्षमता है मन को समझ पाने की। तुम ध्यान से देखो कि चल क्या रहा है। जैसे- जैसे तुम मूल्यों से मुक्त होते जाओगे, वैसे- वैसे तुम पाओगे कि जो कुछ महत्वपूर्ण है, वास्तव में महत्वपूर्ण है, मन का उसकी ओर एकाग्र होना आसान हो गया है।

कबीर का दोहा है –

पहले तो मन कागा था, करता जीवन घात।

अब मनवा हंसा भया, मोती चुन चुन खात।

मन हमारा कागा जैसा, कौआ जैसा कर दिया है। वो सिर्फ विष्ठा, मल ही खाता है। वो जहाँ कहीं दुर्गन्ध, सड़न देखता है, तुरंत उधर को चला जाता है। अच्छा दो लोग बैठ कर के व्यर्थ चर्चा कर रहे हैं, मन आकर्षित हो गया। टी.वी. में सड़ा हुआ कार्यक्रम आ रहा है, मन तुरंत उधर को पहूँच गया। किसी की निंदा चल रही है, तुरंत हम भी उसमें जुड़ गए। पहले तो मन कागा था, करता जीवनघात। और जब मन ऐसा होता है जो सिर्फ मल की ओर आकर्षित होता है तो ये जीवनघात है। तुम अपने जीवन को ख़त्म किये दे रहे हो। अब मनवा हंसा भया। मन का शोधन किया जा सकता है। मन हंस के जैसा हो सकता है। अब मनवा हंसा भया मोती चुन चुन खात। ऐसा भी हो सकता है। कैसे होगा?

प्र: सर कहते हैं की आदमी को परिस्थिति के अनुसार ढल जाना चाहिए। तो हम अपने मन को ऐसा कर लें कि वो परिस्थिति के अनुसार ढल जाए।

आचार्य: सवाल पर फिर से जाओ। मैं कह रहा हूँ कि हमारे मन ने एक आदत पकड़ ली है। वो आदत क्या है? गंदगी की ओर ही जाने की। मन को ऐसा कैसे कर दिया जाए कि हमें उसे धक्का ही ना देना पड़े, वो स्वतः ही मोती की ओर जाए। उसके सामने तुम कितनी भी विष्ठा रख दो, भले ही वो भूखा मर रहा हो, पर उसकी ओर ना जाए।

प्र: पहले भी हम समझाते थे की ये चीज़ अच्छी है। अब हमें समझाना पड़ेगा कि ये चीज़ अच्छी नहीं है, ये अच्छी है।

आचार्य: समझाना पड़ेगा। ठीक है बढ़िया तरीका है, समझाना पड़ेगा। कैसे समझाओगे?

प्र: सर, एक तरफ पढ़ाई है और एक तरफ मूवी। मूवी का शोर आ रहा है कि गाना अच्छा है, मूवी अच्छी है लेकिन मन को समझाना पड़ेगा कि पढ़ाई ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है, पढ़ाई ज्यादा अच्छी है।

आचार्य: मन बड़ा चालाक है। वो खूब तर्क करेगा। वो पूछेगा कैसे? उसे समझाओ, तुम्हें समझाना पड़ेगा। बताओ कैसे? मन कहेगा कि तुम पढ़ाई क्यों कर रहे हो? सुख के लिए। कि पढ़ोगे तो पैसा कमाओगे, फिर सुख मनाओगे। मन कहेगा कि अभी बगल के कमरे में मनोरंजन है, सुख है, तो चलो सुख पा लेते हैं। अब मन ने तुम्हें तर्क दे दिया। अब कैसे समझाओगे मन को? मन जीता, तुम हारे। बड़ी दिक्कत हो गयी। बोलो कैसे समझाओगे? मन ने तर्क दे दिया है। जो मैंने अभी कहा वही तर्क दे दिया है मन ने। क्या उत्तर है इस तर्क का तुम्हारे पास? जब अंततः सुख ही पाना है तो अभी क्यों ना सुख ले लूँ। बाद में मूवीज़ की कोई कमी आ जाने वाली है, तो दुख कहाँ आ जा रहा है बाद में। और फिर सुख के लिए है सब कुछ और मैं कह रहा हूँ कि सुख मुझे अंततः मिल रहा है, तो अभी क्या मिल रहा है मुझे? दुःख। तुम मन को जो प्रक्रिया बता रहे हो कि अभी ये करो, अभी वो करो आखिर में सुख मिलेगा, तो मन तुम्हें तर्क देगा तो अभी क्या मिल रहा है? दुःख। तो अभी जिसमें सुख मिल रहा है, वो सुख क्यों ना ले लूं, चलो घूमनें चलते हैं। मन कहेगा बाद की देखी किसने है, क्या पता जियेंगे भी कि नहीं। क्या पता बाद में क्या होगा? पर मुझे ये पता है कि अभी मुझे सुख उपलब्ध है। मैं अभी क्यों ना उसमें नहा लूं। और मन यही कहता है। मन के पास बड़े बड़े तर्क हैं। मन कहता ही यही है अब तुम क्या जवाब दोगे ?

प्र: सर, मन की परिभाषा चेंज कर देंगे।

आचार्य जी (शाबाशी देते हुए): बड़ा बढ़िया लग रहा है सुन कर। तो सुख और दुःख को पुनः परिभाषित करना होगा। बहुत बढ़िया। शुरू हमने किया था एकाग्रता से, और बात चलते चलते कहाँ आ गयी? कि जब तक हमें यही नहीं पता कि सुख कहाँ और दुःख कहाँ, तब तक हमारी एकाग्रता गड़बड़ ही रहेगी। मन गलत डाल पर ही बैठेगा। एकाग्र तो होगा, पर एकाग्रता का विषय गड़बड़ रहेगा। तो चलो अब सुख और दुःख की अब नयी परिभाषा खोजते हैं। बताओ क्या नई परिभाषा खोजनी है सुख की और दुःख की?

आचार्य: चलो एक नयी परिभाषा देखतें हैं सुख की। पहली बात- सुख समय पर या स्थिति पर आश्रित नहीं हो, तभी हम कह सकतें हैं कि वो सुख है। जो सुख भविष्य का है वो सुख है ही नहीं। वो मात्र?

प्र: कल्पना है।

आचार्य: बहुत बढ़िया। कल्पना है। कल्पना मिथ्या होती है। तो सुख कौन सा हुआ? जो एकमात्र…?

प्र: अभी है।

आचार्य: अभी है। प्रेजेंट है। दूसरी बात सुख समय पर तो आश्रित है ही नहीं। सुख परस्थिति पर, किसी व्यक्ति पर भी आश्रित नहीं हो सकता। सुख किसी और पर निर्भर हो नहीं सकता तो इसका मतलब एकमात्र सुख कौन सा हुआ? जो पूरे तरीके से मेरा है, जो आतंरिक है, जो किसी और के मिलने से नहीं मिल सकता कि मैं कुछ हासिल कर लूं, कोई पद, कोई व्यक्ति, कोई मुकाम तो मुझे मिलेगा। दोनों बातों को मिलाओ। पहली बात से ये निकल के आया कि वास्तविक सुख अभी है और दूसरी बात कि वास्तविक सुख किसी दूसरे पर निर्भर नहीं है। आतंरिक है, मेरा है। यदि सुख कि हम ये नयी परिभाषा रख सकें तो सुख चाहने वाले मन को अब क्या करना पड़ेगा? मन सुख ढूँढता है। मन को सुख जहाँ दिखता है, वहीं जा कर बैठता है। अब हमने मन को बताया कि सुख अभी है, सुख आतंरिक है। अब मन को कहाँ जाना पड़ेगा? कहीं नहीं। तो मन कहाँ रहेगा? अपने पास। तुम जहाँ भी हो मन…?

प्र: वहीँ रहेगा।

आचार्य: तुम जो भी कर रहे हो मन…?

प्र: वही करेगा।

आचार्य: एकाग्रता की समस्या…?

प्र: हल हो गयी।

आचार्य: तो एकाग्रता की समस्या मूलतः ये थी कि हमने सुख की परिभाषा गलत रखी थी। हमें बता दिया गया था कि सुख कहाँ पर है?

प्र: भविष्य में।

आचार्य: और हमें बता दिया गया था कि सुख कैसे मिलता है?

प्र: दूसरों के द्वारा।

आचार्य: दूसरों के द्वारा, हासिल कर लेने पर, कोई हमें मान्यता दे दे। दूसरे आ कर हमारी तारीफ कर दें। दूसरा हमें प्रेम कर दे। हमें दो गलत बातें बता दी गयीं थीं सुख के बारे में। फिर से हम दुहराएंगे। क्या थीं वो बातें? पहली क्या थी कि सुख कहाँ है?

प्र: भविष्य में।

आचार्य: और दूसरी क्या थी कि सुख कैसे मिलता है?

प्र: दूसरों में।

आचार्य: तो इसका नतीजा क्या होता था कि मन कहाँ को भागता था? दूसरों की ओर। और समय में कहाँ को भागता था? भविष्य की ओर। पर जैसे ही तुमने मन से कहा कि ध्यान से देख। भविष्य में तो मात्र कल्पना है, सुख नहीं है। कि ध्यान से देख कि सुख दूसरों से कैसे मिल सकता है। जो सुख दूसरों से मिलेगा उसमें तो डर रहेगा कि कहीं छिन ना जाए। आश्रित हो दूसरों पर छिन सकता है। तो इसीलिए वास्तव में सुख मेरा हो सकता है, अपनी आतंरिक मौज। कभी ना छिनने वाली मस्ती। अब मन कहीं उड़ कर के जाएगा ही नहीं। उसे आवश्यकता ही नहीं कहीं जाने की । तुमने मन को स्पष्ट कर दिया कि सुख कहाँ है? और समय में कहाँ है?

प्र: आतंरिक है, अभी है।

आचार्य: पर बात सिर्फ मेरे कहने भर की नहीं है। तुमको मन से बातचीत करनी पड़ेगी। अभी तो कहा है। आगे का काम तुम्हें करना है। तुम्हें मन से बातचीत करनी है कि जो कर रहे हैं उसी में?

प्र: सुख है।

आचार्य: मुझे दूसरों पर भी.…?

प्र: आश्रित नहीं रहना है।

आचार्य: ठीक है ना। उसके बाद देखना, जहाँ तुम हो मन वहीं रहेगा। कहीं भागेगा नहीं। बात आ रही है समझ में?

प्र: जी सर।

आचार्य: चलो ठीक है।

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